Thursday, April 4, 2019

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आज़ादी के बाद अब तक 16 लोकसभा के लिए हुए चुनाव में जीते मुस्लिम सांसदों और हर लोकसभा में उनके प्रतिशत पर नजर डालें तो बड़े दिलचस्प आंकड़े सामने आते हैं.
पहली लोकसभा से लेकर छठी लोकसभा तक मुसलमानों का प्रतिनिधित्व धीरे-धीरे बढ़ा.
जहां पहली लोकसभा में महज़ 21 मुस्लिम सांसद चुने गए थे, वहीं छठी लोकसभा में ये संख्या 34 तक पहुंच गई.
लोकसभा में मुसलमानों का प्रतिशत 4.29 से लेकर 6.2 साल तक पहुंच गया.
सातवीं लोकसभा में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व ने अचानक उछाल मारी और लोकसभा में मुसलमानों की संख्या 49 तक पहुंच गई.
तब लोकसभा में मुसलमानों का प्रतिशत 9.26 था. 1984 में हुए आठवीं लोकसभा के लिए चुनाव में 46 मुस्लिम सांसद जीते लेकिन 1989 में आंकड़ा गिर कर 33 रह गया.
ये वही दौर था जब लोकसभा में बीजेपी के सांसदों की संख्या बढ़नी शुरू हुई. इसी के साथ लोकसभा में मुस्लिम सांसदों की संख्या गिरने का सिलसिला शुरू हो गया.
1989 में बीजेपी के 86 सांसद जीते थे और इसी चुनाव में मुस्लिम सांसदों की संख्या 46 से गिरकर 33 पर आ गई.
यानी लोकसभा में सीधे-सीधे 13 मुस्लिम सांसद कम हो गए. 1991 में बीजेपी ने 120 सीटें जीती थीं तब मुस्लिम सांसदों की संख्या और गिरकर 28 पर आ गई.
साल 1996 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने 163 जीती थीं तब भी सिर्फ 28 मुस्लिम सांसद ही जीत पाए थे.
साल 1998 में हुए लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने 182 जीती थीं तब लोकसभा में 29 मुस्लिम सांसद जीते थे.
साल 1999 बीजेपी ने फिर से 182 सीटें ही जीतीं. इस बार मुस्लिम सांसदों की संख्या 32 हो गई.
लेकिन 2004 में जैसे ही बीजेपी 182 सीटों से 138 सीटों पर लुढ़की मुस्लिम सांसदों की संख्या बढ़कर 36 हो गई.
साल 2009 मैं 15वीं लोकसभा के लिए हुए आम चुनाव में मुस्लिम सांसदों की संख्या गिरकर 30 पर आ गई.
लोकसभा में मुसलमानों का घटता प्रतिनिधित्व चिंता का विषय है. लेकिन इसकी चिंता किसी को है नहीं.
सवाल ये है कि जब समाज के दबे कुचले तबके को उसकी आबादी के अनुपात में लोकसभा में प्रतिनिधित्व दिया गया है तो फिर मुस्लिम समुदाय को इस फॉर्मूले से क्यों बाहर रखा गया है. साल 2006 में आई सच्चर कमेटी की रिपोर्ट साफ तौर पर कहती है कि देश में मुसलमानों की हालत दलितों से बदतर है.
अगर दलितों को उनकी आबादी के हिसाब से लोकसभा में मिला हुआ है तो फिर मुसलमान इस हिस्सेदारी से वंचित क्यों हैं.
लोकसभा में बीजेपी का है मुसलमानों का प्रतिनिधि 4.24 से लेकर 6.24 के बीच रहा है जो आबादी के प्रतिशत 14.2% से बहुत कम है.
ग़ौरतलब है कि समाज के सबसे निचले हिस्से दलितों और आदिवासियों को लोकसभा में उनकी आबादी के हिसाब से आरक्षण मिला हुआ है.
लोकसभा की 84 सीटें दलितों के लिए आरक्षित है वहीं 47 सीटें आदिवासियों के लिए आरक्षित है इनके अलावा हर लोकसभा में एंग्लो इंडियन समाज के दो लोगों को नामित किया जाता है.
ताकि उनकी आबादी के हिसाब से लोकसभा में उन्हें प्रतिनिधित्व मिल सके.
संविधान बनाते वक्त महसूस किया गया थी कि एंग्लो इंडियन समाज की आबादी देश में किसी भी लोकसभा सीट पर आबादी इतनी नहीं है कि वो अपना प्रतिनिधि चुनकर लोकसभा में भेज सकें.
पिछले करीब ढाई दशक से लोकसभा में महिलाओं के 35% आरक्षण देने की भी कोशिश हो रही हैं. उसके पीछे भी यही तर्क है कि महिला सशक्तिकरण के लिए राजनीति और सत्ता में आबादी के हिसाब से उनकी हिस्सेदारी जरूरी है.
17वीं लोकसभा में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व बढ़ेगा या घटेगा. यह तो चुनावी नतीजे बताएंगे. लेकिन देर सबेर ये मुद्दा लोगों की नज़र खींचेगा.

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